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Showing posts from February, 2025

कॉलेजियम व्यवस्था भारतीय न्यायपालिका के लिए खतरा है ? -Kamlakant Kale

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कॉलेजियम सिस्टम भारतीय न्यायपालिका के लिए खतरा बन चुका है। न्यायपालिका ने किसानों और मजदूरों के अधिकारों की अनदेखी की है। ईवीएम में गड़बड़ियों पर सुप्रीम कोर्ट ने पर्दा डालने का काम किया है। न्यायपालिका का चरित्र सामाजिक होना चाहिए, अन्यथा यह लोकतंत्र के लिए संकट पैदा करेगा। ✅ जजों की नियुक्तियों में विविधता की कमी से न्यायपालिका का जातीय चरित्र बिगड़ रहा है। इससे न्यायिक निर्णयों में पक्षपाती रवैया देखने को मिल रहा है। ✅ सुप्रीम कोर्ट के फैसले, जैसे राम मंदिर विवाद, पर न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठे हैं। और यह स्पष्ट होता है कि आस्था के आधार पर निर्णय किए जा रहे हैं। ✅ इलेक्टोरल बंड का मामला चुनावी भ्रष्टाचार का एक बड़ा उदाहरण है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक माना, लेकिन राजनीतिक पार्टियों के पास ही पैसा रहने दिया। ✅ ईवीएम के मुद्दे पर कई चुनावों में गड़बड़ियों के आरोप लगे हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की तरफ से इन मामलों की सुनवाई में पारदर्शिता नहीं दिखाई गई। ✅ सरकार ने लेबर लॉ में बदलाव किये, इस पर भी सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के हित में निर्णय किए गए हैं, जिससे मजदूरों के संवैधा...

अति पिछड़ी एवं घुमंतू जनजातियों की दशा और उनकी दिशा -Kamlakant Kale |

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अति पिछड़ी और घुमंतू जनजातियों की वर्तमान स्थिति और विकास की दिशा का विश्लेषण महत्वपूर्ण है। इसके लिए उनकी सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को गहराई से समझना आवश्यक है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि भारत में उन्हें किस प्रकार का अन्याय और अत्याचार झेलना पड़ रहा है। आजादी के बाद भी इनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है, जो एक गंभीर विषय है।  यह घुमंतु जातियों की सबसे बड़ी बात क्या है इन्हे चाहे उनको कितना भी प्रताड़ित किया गया हो। मगर 2000 साल से ज्यादा समय हो गया उन्होंने अपना कल्चर नहीं छोड़ा। आज हर घुमंतु जाति के पास अपनी बोली भाषा है, उनका लोक संगीत है,  उनका लोक नृत्य है, उनका अपना झंडा है, हर चीज उनकी ब्राह्मणों से स्वतंत्र है।इसलिए कोई भी अनपढ या कम पढ़ा लिखा जो घुमंतु जाति का व्यक्ति है अपने किसी कार्यक्रम के लिए ब्राह्मण को नहीं बुलाएगा। हा पर पढ़ा लिखा जरूर बुलाएगा और पहले नंबर पर बुलाएगा। आरक्षण नीति को बनाते समय एक भूमिका यह थी कि इससे जो सामाजिक ध्रुवीकरण होगा, सोशल पोलराइजेशन होगा, समान हितों पर, एक कॉमन इंटरेस्ट पर, कॉमन ऑब्जेक्ट पर यह जाति...

आजादी के बाद भी घुमंतू जनजातियाँ जाति व्यवस्था की शिकार बनी हुई हैं -Mr. Govind Sonnar

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   आजादी के बाद भी घुमंतू जनजातियाँ जाति व्यवस्था की शिकार बनी हुई हैं। इन जनजातियों के खिलाफ आज भी जातिगत भेदभाव जारी है, जो कि उनकी Dignified जीवन शैली के लिए एक बड़ी चुनौती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इन लोगों के साथ अन्याय एवं अत्याचार आज भी जारी हैं, जिससे उनके जीवन में निरंतर कठिनाइयाँ बनी हुई हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ इन समुदायों को सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर धकेल दिया गया है, और यह स्थिति समय के साथ और भी गंभीर होती जा रही है।  ✅ यह घुमंतु जनजातिया और एमबीसी कौन है? हम सभी लोगों को ओबीसी तो मालूम है। क्योंकि ओबीसी का जिक्र हमेशा आता है मगर ये जो एमबीसी है Most Backward Class यह जो पिछड़ी जातियां है ये उनमें से भी पिछड़े हैं यानिकि पिछड़े में भी पिछड़े इससे आप अंदाजा लगा सकते हो की ये कितनी पिछड़ी है ✅आजादी के 70-75 साल बाद भी अगर Most Backward Class है तो आप इससे अंदाजा लगा सकते हो की ये कितनी पिछड़ है। अगर इनको देखा जाए तो यह ज्यादा से ज्यादा गांव में सेवा देने वाली जातियां है जैसे कि इसको हिंदी में तो क्या कहते हैं मुझे मालूम नहीं मगर महाराष्ट्र के मराठी...