अति पिछड़ी एवं घुमंतू जनजातियों की दशा और उनकी दिशा -Kamlakant Kale |
अति पिछड़ी और घुमंतू जनजातियों की वर्तमान स्थिति और विकास की दिशा का विश्लेषण महत्वपूर्ण है। इसके लिए उनकी सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को गहराई से समझना आवश्यक है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि भारत में उन्हें किस प्रकार का अन्याय और अत्याचार झेलना पड़ रहा है। आजादी के बाद भी इनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है, जो एक गंभीर विषय है।
यह घुमंतु जातियों की सबसे बड़ी बात क्या है इन्हे चाहे उनको कितना भी प्रताड़ित किया गया हो। मगर 2000 साल से ज्यादा समय हो गया उन्होंने अपना कल्चर नहीं छोड़ा। आज हर घुमंतु जाति के पास अपनी बोली भाषा है, उनका लोक संगीत है, उनका लोक नृत्य है, उनका अपना झंडा है, हर चीज उनकी ब्राह्मणों से स्वतंत्र है।इसलिए कोई भी अनपढ या कम पढ़ा लिखा जो घुमंतु जाति का व्यक्ति है अपने किसी कार्यक्रम के लिए ब्राह्मण को नहीं बुलाएगा। हा पर पढ़ा लिखा जरूर बुलाएगा और पहले नंबर पर बुलाएगा।
आरक्षण नीति को बनाते समय एक भूमिका यह थी कि इससे जो सामाजिक ध्रुवीकरण होगा, सोशल पोलराइजेशन होगा, समान हितों पर, एक कॉमन इंटरेस्ट पर, कॉमन ऑब्जेक्ट पर यह जातिया इकट्ठा होंगी उससे शक्ति का निर्माण होगा और उस शक्ति का उपयोग व अपनी समस्या का समाधान करने लायक हो जायेंगे। मगर आज मंडल कमीशन के 30 साल के बाद अगर आप देखेंगे तो रिजर्वेशन के मामले में जागृति कम है प्रति जागृति ज्यादा हो गई है। अगर इन्हीं पिछड़ी जातियों में से कोई भी एक जाति आरक्षण की मांग करती है तो बाकी तमाम सारी जातिया उसके विरोध में खड़ी हो जाती है।
ज्योतिराव फुले जी के जन्मदिन के मौके पर ही बीजेपी ने मध्य प्रदेश में जो ट्रांसजेंडर है उन ट्रांसजेंडर लोगों को ओबीसी के लिस्ट में शामिल किया। बहुत सारे लोग जानते होंगे कि रिजर्वेशन भारत में दो प्रकार से इंप्लीमेंट होता है। एक वर्टिकल रिजर्वेशन है और एक पैरेलल या हॉरिजॉन्टल रिजर्वेशन है। तो जो ट्रांसजेंडर है उस ट्रांसजेंडर को ओबीसी के लिस्ट में डाल दिया अब किसी व्यक्ति का ट्रांसजेंडर होना यह उसका मेडिकल कंडीशन है उसका उसके सोशल कंडीशन से कोई लेना देना नहीं है कुछ स्टेट ने तो जो अनाथ बच्चे है उन अनाथ बच्चों को भी ओबीसी के लिस्ट में डाला है। तो यह सारा सेंट्रल जो है, स्टेट जो है वो सरे बैकवर्ड क्लासेस के लोगों के साथ में ये धोखेबाजी कर रहे हैं।
भगवा का संबंध साथियों ब्राह्मणों से नहीं है। भगवा ब्राह्मणों का नहीं है। यह बुद्ध की विचारधारा से जुड़ा हुआ है। यह हमारी अपनी विरासत है। इसलिए इसका संबंध जो है वह हमारी विरासत से इसका कोई संबंध ब्राह्मणों से नहीं है। त्रिपिटक आप उठाकर देख लीजिए जितनी बार वहां भगवा शब्द आया है लगभग 8000 बार से ज्यादा समय भगवा शब्द का उल्लेख त्रिपिटक में हुआ है।
- उपरोक्त विषय पर पूरी जानकारी एक वीडियो में उपलब्ध है, जिसका लिंक नीचे दिया गया है।

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