क्या घुमन्तु जनजातियों की अलग सूची बनानी चाहिए -Manohar Kokare

क्या घुमन्तु जनजातियों की अलग सूची बनानी चाहिए, ताकि उनकी सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति को बेहतर समझा जा सके? इससे उनकी चुनौतियों और आवश्यकताओं की पहचान करना आसान होगा, जिससे उनकी पहचान को मान्यता मिलेगी और विकास के लिए उपयुक्त नीतियों का निर्माण संभव हो सकेगा.


✅ मैं एक घुमंतु जातु से जाति से आता हूं. जिसे महाराष्ट्र में धनगर नाम से जाना जाता है धनगर जो थे यह पुराने जमाने में शुपालक नाम से संबोधित किया जाता था बोला जाता था पशुपालक जो थे वह चंद्रगुप्त मौर्या के काल से राजा थे सम्राट अशोक चंद्र गुप्त मौर्या से लेकर आज तक हमने एक सब भारतवर्ष के ऊपर राज किया था लेकिन आज हमारी जो स्थिति है वह इस गांव से दूसरे गांव सरे गांव से तीसरे गांव भटकने पर मजबूर है क्योंकि हमारे समाज में कोई लीडरशिप डेवलप नहीं हो रही और जो लीडरशिप तो डेवलप हो रही है लेकिन उनमें सामाजिक ईमानदारी का अभाव है जब भी कोई लीडरशिप डेवलप होती है उसको खत्म करने का यह वस्था पूरी तैयारी करे हुए हैं।

✅आज भी महाराष्ट्र के अंदर या कहीं पर भी घुमंतु जाति में घुमंतु जाति जो है वह एससी में है कहीं एसटी में है महाराष्ट्र में ओबीसी में है और उसको एक अलग नाम भी दिया गया है जो एनटी बोला जाता है कई डीएनटी उसमें कैटेगरी करके एनटी में वन एनटी, टू एनटी यह पूरी तरकीब उन्होंने सोच के रखी है कि इनको कैसे गांव-गांव भटका या जाए और इस व्यवस्था से अलग रखा जाए व्यवस्था से अलग रखने की पूरी तैयारी इस ब्राह्मण और क्षत्रिय लोगों ने जो व्यवस्था में कब्जा करके बैठे हुए हैं उन्होने करके रखी हुए।
✅ तो हम लोग जो महाराष्ट्र में मांग करते थे कि हमको एसटी कैटेगरी में जोड़ा जाय तो एसटी कैटेगरी ने विरोध किया कि आप एसटी में नहीं आ सकते हमारे हिस्से का आप नहीं खा सकते हम पुराने जमाने से भी एसटी में है लेकिन आप एसटी में नहीं है ठीक है कोई दिक्कत नहीं हमारा अलग शेड्यूल इस व्यवस्था में बनना चाहिए जो घुमंतु जाति है जो भटकंती करने वाली जातिया गांव-गांव भटकने वाली जातिया उसको यह तक पता नहीं होता है कि हम आज कहां पर रुके य स्मशान भूमि है, यह गांव के नदी का किनारा है, य कोई साप काटेगा या कोई बिच्छू काटेगा यह भी पता नहीं होता है।
✅ हम कहां पे ऐसी हमारी पिछड़ी जातियों में हम गिने जाते हैं तो हमको ट्राइब जो नेटिव ट्राइब बोल के तो ट्राइब यानी गांव भटकंती करने वाला एक समाज बोला जाता है तो उसको हमार को अलग एक पहचान देना अलग शेड्यूल बनाने की हमारा अपना एक मांग

यूनिटी ऑफ मूलनिवासी समाज की तरफ से मैं मांग रखता हूं कि हमारी एक देश के अंदर अलग सूची बनाई जाए यही बोलक मैं अपनी दो बातें खत्म कर देता हूं बस -धन्यवाद -Manohar Kokare

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